पृष्ठभूमि
- मंत्रालय का समाज के वंचित और हाशिए वाले वर्गें के कल्याण के संवर्द्धन, सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण सुनिश्चित करने का दायित्व है। मंत्रालय का उस लक्ष्य समूह के पास पहुंचने का दायित्व है जिसमें अनुसूचित जातियों, अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग, विकलांग, वृद्धजन, गली कूचों के बच्चे तथा अत्याचार पीड़ित शामिल है। उद्देश्य यह है कि उन्हें उनकी सामाजिक, शारीरिक तथा शैक्षिक अयोग्यताओं पर काबू पाने में सहायता देकर विकास की मुख्य धारा में लाना है। इस प्रकार उनकी प्रगति क्षमता निर्माण के माध्यम से सुनिश्चित की जा सकती है। इसके परिणामस्वरूप, वे अपनी निर्भरता को कम करने की अपनी पूर्ण क्षमता/दूसरों पर निर्भरता तथा इष्टतम संभव सीमा तक निर्भरता हासिल करने के लिए अपनी क्षमताओं से सुसज्जित हो सके - सरकार द्वारा प्रदत्त इस प्रकार की सहायता का अंतिम लक्ष्य है।
- केन्द्र और राज्य सरकारों के पास उपलब्ध वित्तीय संसाधन सीमित हैं और अतः यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि राज्य के संसाधन इष्टतम रूप से उपयोग किए जाए ताकि अधिकतम संख्या में अधिकतम लाभ लिया जा सके। यह माना गया है कि राज्यों के प्रयासों के साथ-साथ, लक्ष्य समूहों की स्व-सेवी संगठनों के लिए सहायता सेवाएं अति आवश्यक है। वे राज्य के प्रयासों की सम्पूरकता यह सुनिश्चित करने में करते हैं कि लाभ अधिकतम लोगों तक पहुंच सकें। कतिपय मामलों में, वे स्व-सेवी संगठन ही है कि जो सरकारी स्कीमों के कार्यान्वयन में बेहतर स्थिति में और स्वयं सरकार से अपेक्षा अधिक कार्यक्षम हो सकते हैं। इसका श्रेय मुख्यतया उच्च प्रतिबद्ध तथा समर्पित जनशक्ति कोजाता है जो स्वयंसेवी संगठनों के पास उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त, अक्षरशः उनके पास बेहतर विशेषज्ञता होती है तथा और वे स्थानीय स्थितियों के बारे में अधिक जानकारी रखते हैं। जिससे उनका डिलीवरी सिस्टम बेहतर बनता है जो सरकार नहीं कर सकती है। अतः राष्ट्र और समाज निर्माण में स्वयंसेवी संगठनों की सहभागिता को बढ़ाना न केवल वांछनीय है बल्कि आवश्यक भी है।
- स्वयंसेवी संगठनों की उपस्थिति समस्त राष्ट्र में एक समान नहीं है। इसी प्रकार ऐसी अनेक कार्यक्षेत्र है जहां अधिक स्वयंसेवी संगठन आकर्षित होते हैं जिससे कुछ क्षेत्रों में उनका संकेन्द्रण हो जाता है। यह दोहरी स्थिति अक्सर कर क्षेत्रों तथा सेक्टरों के असंतुलित विकास में तब्दील हो जाती है। मंत्रालय का क्षेत्रों में सेक्टरल वृद्धि के साथ-साथ के क्षैतिज विस्तार को प्रोत्साहन देना है जिसे तुलनात्मक रूप से कम ध्यान प्राप्त होता है या अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
- मंत्रालय का यह भी अनुभव है कि कुछ स्वयंसेवी संगठन मंत्रालय से वित्तीय सहायता का लाभ लेने के लिए अन्यों की अपेक्षा बेहतर रूप से सुसज्जित हैं। सैद्धान्तिक रूप से, कम संसाधन क्षेत्रों और सेक्टरों के अनुसार स्वयंसेवी संगठनों के लिए उपलब्ध होने चाहिए। जिन्हें समाज के समक्ष पेश आ रही समस्याओं से ग्रसित हों तथा सरकार द्वारा अभिज्ञात वरीयताओं के अनुसार हस्तक्षेप अपेक्षित हैं।
- कुछ स्वयंसेवी संगठन सरकार से प्राप्त अनुदान अनन्य रूप से अनुदान से फले फूले है। यह ऐसी स्थिति है जिसे बदलने की आवश्यकता है। स्वयंसेवी संगठन सरकार से प्राप्त सहायता पर खड़े होने में सक्षम होने चाहिए तथा उन्हें अन्य समर्थन व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए जो क्रमिक रूप से सरकार पर उनकी निर्भरता को कम कर सकें। ऐसी कोई नीति अधिक स्वयंसेवी संगठन की वृद्धि को समर्थ बना सके। ताकि वे अधिक सेक्टरों में कार्य कर सकें। सरकार का उद्देश्य न केवल विद्यमान स्वयंसेवी संगठनों की सहायता करना है बल्कि नए स्वयंसेवी संगठनों की वृद्धि को प्रोत्साहित भी करना है।
- स्वयंसेवी संगठनों का अपनी प्रचालन के लिए अन्य स्रोतों से सहायता प्राप्त करना भी आशय होना चाहिए। इसे सरकार की सहायता के साथ अपने आप को स्थापित करने तथा व्यापक रूप से समाज के लिए उनकी उपयोगिता को सिद्ध करने में सक्षम होने के पश्चात प्राप्त किया जा सकता है। इस विश्वनीयता के साथ कि वे कमाई करने में सक्षम हो सके, वे औद्योगिक घरानों तथा समाज से भे सहायता प्राप्त कर सके। वस्तु और वित्तीय दोनों अंशदानों को एक बार विश्वनीयता को मजबूती से पहचाने के पश्चात आसानी से बनाया जा सके। इस प्रकार अतिरिक्त संसाधनों को संघठित किया जा सके।
- स्वयंसेवी संगठनों को उस सामाजिक कार्यकलाप जिसे वह संगठन निष्पादित करे, में समुदाय की संलिप्तता के लिए अधिक वरीयता भी दी जानी चाहिए। परियोजनाओं में सामुदायिक संलिप्तता के अनेक गोचर और परिणामी या संगामी लाभ हैं। इससे कार्यक्रम की प्रभावकारिता सुधार करने में लाभार्थियों के प्रति परिवर्तित प्रवृत्ति प्रभावित, उस सहायता की अत्यधिक आवश्यकता को अभिज्ञात करने तथा प्रभावितों और जो इसे पसन्द करते हैं मानस में (समाज द्वारा स्वीकृति अथवा मान्यता की भावना को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है) परिवर्तन करने में मदद मिलेगी।
- स्वयंसेवी संगठनों को एक ऐसी व्यवस्था के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाए जो जतना, औद्योगिक घरानों, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से संसाधन जुटाने के लिए अनुदान प्राप्त करने में मदद कर सके।



